Wednesday, September 16, 2009

याद आती ही तेरी ए मेरी दोस्त ,तुने किए थे कई वादे
तुम्हारी ही निशानियाँ दिखती है हर जगह
जितना भूलना चाहती हूँ , उतनी ही याद आती हो तुम
इस जिंदगी के कई मंजिले तुम्हारे बिना ही तय किए है
तुम्हारे बिना ही तय किए गए मंजिले अधूरे लगते है
तुम होती तो शायद जिंदगी और आसान होजाती
जब हम एकदूसरे के करीब थे मैंने कभी नही जाना,
तुम क्या थी मेरे लिए ,जब जाना तब तुम दूर जा चुकी थी
मुझे आज याद आरही है ,तुम्हारी वो नजर
जिसमे कई भाव छिपे थे ,जिनकी भाषा आज मैंने समझा
क्यूंकि आज मेरी नजर तुम्हे ढूँढ रही है
मुझे इस जिंदगी ने बहुत कुछ दिया है
तुम जो एक बार मिल जाते ,यही दुवा है
जहा हम ने गुजारे दोस्ती के वे पल ,
आज भी मैं वहा तुमको महसूस करती हूँ
तुम भी मुझे याद करती होगी
ये जिंदगी न जाने कब रूठ जाए ,
ये धड़कन ना जाने कब रुक जाए ,
आजाओ मेरे दोस्त एक बारे गले मिलकर आंसू बहा लें
पूरब से निकला सूरज ,दिन के उजालो को बिखेरता है
जीवन में तेरी यादे ,वैसे ही खुशियाँ लाती है
जीवन के अंधेरो का उजाले से भर दिया तुमने
कैसे कहूं क्या किया तुमने

Tuesday, September 15, 2009


यादो के पन्नो को पलट कर देखा तो तुम ही तुम दीखते हो ,
फूलो में , पत्तो में , नीले आकाश में , झाँक कर मुझे देख रहे होंगे
सागर किनारे किए थे तुमने ,कितने ही बातें ,
उन की कसम तुम्हे लौट आना होगा ,
नीरवता से निकल कर चलो चले
जहाँ केवल हम दो ही रहे
मंगा की भी बहुत याद आती है ,वोःआशालता के एकदम विरुद्ध थी उसके आते ही हम अपने अपने कमरों की तरफ़ भाग जाते थे ,जैसे की "मैं हूँ ना "पिक्चर में बिन्दु को देख कर सब भाग जाते है ठीक वैसे ही सीन हो जाता था हम माँ से उसे निकाल देने को कहते थे माँ ने मानो उसे गायिका बनाने की प्रतिज्ञा ली थी माँ ने उसे सुबह पाँच बुला कर उससे रियाज कराने की कोशिश की पर सफल नही हुई क्यूंकि मंगा का स्कूल टाइम सुबह का था केवल इतवार के दिन उसे बुलाया जाता था हारमोनियम पर माँ सरगम सिखाती थी ,मंगा माँ के पीछे पीछे बेसुरी सरगम की ताने लेती थी जिसका शब्दों में वर्णन करना बहुत मुश्किल है पर तीन साल बाद उसकी शादी ही गई और हमने राहत की साँस ली
उन दिनों दशहरा से दीपावली तक एक महीना विद्यालय बंद रहते थे सड़क में एक अलग माहोल छा जाता था बच्चे तो बच्चे मताए भी हंगामा करती थी कबड्डी ,खो-खो,रस्सी कूद ,रिंग,केरम,अन्त्याक्षरी ,खेलते थेनाचते थेमाताए तरह-तरह की पकवाने बनकर मिलकर एक बैठकर खाते थे उन्दिनो की याद कभी नही जायेगी

Monday, September 14, 2009

बात उन दिनों की थी जब सबकुछ सही चल रहा थामाँ वायोलिन सिखाती थी उन्होंने हमेबहुत कम उम्र में ही संगीत सिखाया था हम इतने माहिर हो गए किउनके अनुपस्थिति में हम बच्चों को संगीत सिखाते थे ,
मुझे माँ की उस ग्रूप में एक लड़की बहुत पसंद थी उसका नाम आशालता था वो मलयाली थी उनके पिताजी उसे लताजी और आशाजी jजितनीबड़ी गायिका बनाना चाहते थे जब भी मैं जी टीवी का सा रे गा मा पा प्रोग्राम्देखती हूँ तो आशालता की याद आती है काश उस समय भी ऐसे प्रोग्राम्स होते ,हमारी माँ के संगीत के क्लास में कई विद्यार्थी उसमे भाग लेते और मेरा दावा है की प्रतियोगिता जीतते भी
इस ब्लॉग में बहुत कुछ लिखना बाकी है पर अभी के लिए इतनाही \