मंगा की भी बहुत याद आती है ,वोःआशालता के एकदम विरुद्ध थी उसके आते ही हम अपने अपने कमरों की तरफ़ भाग जाते थे ,जैसे की "मैं हूँ ना "पिक्चर में बिन्दु को देख कर सब भाग जाते है ठीक वैसे ही सीन हो जाता था हम माँ से उसे निकाल देने को कहते थे माँ ने मानो उसे गायिका बनाने की प्रतिज्ञा ली थी माँ ने उसे सुबह पाँच बुला कर उससे रियाज कराने की कोशिश की पर सफल नही हुई क्यूंकि मंगा का स्कूल टाइम सुबह का था केवल इतवार के दिन उसे बुलाया जाता था हारमोनियम पर माँ सरगम सिखाती थी ,मंगा माँ के पीछे पीछे बेसुरी सरगम की ताने लेती थी जिसका शब्दों में वर्णन करना बहुत मुश्किल है पर तीन साल बाद उसकी शादी ही गई और हमने राहत की साँस ली
उन दिनों दशहरा से दीपावली तक एक महीना विद्यालय बंद रहते थे सड़क में एक अलग माहोल छा जाता था बच्चे तो बच्चे मताए भी हंगामा करती थी कबड्डी ,खो-खो,रस्सी कूद ,रिंग,केरम,अन्त्याक्षरी ,खेलते थेनाचते थेमाताए तरह-तरह की पकवाने बनकर मिलकर एक बैठकर खाते थे उन्दिनो की याद कभी नही जायेगी
Tuesday, September 15, 2009
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