याद आती ही तेरी ए मेरी दोस्त ,तुने किए थे कई वादे
तुम्हारी ही निशानियाँ दिखती है हर जगह
जितना भूलना चाहती हूँ , उतनी ही याद आती हो तुम
इस जिंदगी के कई मंजिले तुम्हारे बिना ही तय किए है
तुम्हारे बिना ही तय किए गए मंजिले अधूरे लगते है
तुम होती तो शायद जिंदगी और आसान होजाती
जब हम एकदूसरे के करीब थे मैंने कभी नही जाना,
तुम क्या थी मेरे लिए ,जब जाना तब तुम दूर जा चुकी थी
मुझे आज याद आरही है ,तुम्हारी वो नजर
जिसमे कई भाव छिपे थे ,जिनकी भाषा आज मैंने समझा
क्यूंकि आज मेरी नजर तुम्हे ढूँढ रही है
मुझे इस जिंदगी ने बहुत कुछ दिया है
तुम जो एक बार मिल जाते ,यही दुवा है
जहा हम ने गुजारे दोस्ती के वे पल ,
आज भी मैं वहा तुमको महसूस करती हूँ
तुम भी मुझे याद करती होगी
ये जिंदगी न जाने कब रूठ जाए ,
ये धड़कन ना जाने कब रुक जाए ,
आजाओ मेरे दोस्त एक बारे गले मिलकर आंसू बहा लें
Wednesday, September 16, 2009
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