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Thursday, August 13, 2009

मै अक्सर पिताजी से कहती थी की आप क्यो सबके साथ मिलते नही हो तो कहते थे कि तुम लोग ही मेरी जिंदगी हो तुम्हारे सिवा मुझे कुछ नही चाहिए तुम किसी बात पर मत घबराना किस्सी से मत डरना ,अगर कोई तुम से झगडा करे या कोई भी परेशानी दे तो उनका डटकर सामना करो अपना जीवन अपनी तरह से जियो ,अपने काम के किसी पर निर्भर मत होना जहा तक हो सके किसी से मादा मत लेना
वे स्वयं भी हमारे जिंदगियों में अधिक दखल नही देते थे फ़िर एकदिन अचानक उन्होंने हमसे अलविदा लेलिया ,कितनी खामोशी से उन्होंने निर्मोही बनकर अपने लाडली बेटियों और नन्हे से बेटे को छोड़कर परलोक सिधार गए
मुझे आज भी वोह काली रात याद है जब माँ खिड़की के पास खड़े बहार देख रही थी ,दुसरे दिन हमें नए किराये के माकन में जाना था जिंदगी के नए मंजिलो को तय करना थाहम सब भाई बहन नीचे चार पाई पर सोये हुवे थे अचानक मेरी नींद खुल गई मैंने उनको देखा मुझे बहुत दुःख लगा क्योंकि मेरी माँ बहुत सीधी सादी गृहणी थी उनको चूल्हे के सिवा कुछ नही आता था उनपर सारा दारोमदार आ पडा मई नही जानती माँ के अन्दर कितने तूफ़ान उमड़ रहे थे ,पर मैंने अपने आप से एक कसम लिया कि जिंदगी मई माँ कि जितनी हो सके मदद करुँगी
दुसरे दिन हम नई मंजिलो कि तरफ़ निकल पड़े हमे नही मालू किस तरफ़ जाना है ,कितने दूर जाना है ,कैसी कैसी मंजिले हमारी राह देख रही थीकितनी ही बातें है उसदिन मुझे नही मालूम पर लगता है कि अगर एक और मौका मिले तो काश और अची तरह से पापा के साथ और भी अधिक वक्त निकल सकूकाआआआआआआआआश ऐसा हो सकता,