आज यहाँ इस यन्त्र के पास बैठकर जिंदगी के कुछ पलों को लिखने जा रहीं हूँ कहाँ से शुरू करूँ जिंदगी की अक्षरों का यह सफर समझ में नही आरहा हैबचपन मेंचलती गाड़ी से हर चीज को पीछे जाते देख कर मजा आता था पर जब जिंदगी आगे बदती गई तो मन उदासी से भर जाता रहाछूटेहुवे लोग ,यादें,गली ,दोस्त,पाठशाला ,मन हमेशा उनको ढूँढता ही रहता है
हमारा परिवार माँ पापा,तीन बहनों और एक भाई से भरपूर परिवार थाकई माद्यम वर्गीयों की ही तरह जिंदगी थीपापा भिलाई इस्पत्भावन के उच्चवर्गीय कर्मचारी थ
मध्यप्रदेश में स्थित भिलाई रशिया लोगों द्वारा निर्मित था जिस जगह हम रहते ठ वहां कुछ लोग राष्या के रहने वाले हैं हमारे एक तरफ़ यूपी के शर्माजी और एक तरफ़ आंध्र के नायडू रहते थें
उनके बाजू में एक पंजाबी परिवार था जो बहुत करीबी दोस्त थे जिनको हमारी तेलुगु समझ नही आती और हमें उनकी भाषा पर इससे दोस्ती में कोई फरक नही आता था
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Monday, August 10, 2009
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