Monday, August 10, 2009

पहला अध्याय

आज यहाँ इस यन्त्र के पास बैठकर जिंदगी के कुछ पलों को लिखने जा रहीं हूँ कहाँ से शुरू करूँ जिंदगी की अक्षरों का यह सफर समझ में नही आरहा हैबचपन मेंचलती गाड़ी से हर चीज को पीछे जाते देख कर मजा आता था पर जब जिंदगी आगे बदती गई तो मन उदासी से भर जाता रहाछूटेहुवे लोग ,यादें,गली ,दोस्त,पाठशाला ,मन हमेशा उनको ढूँढता ही रहता है

हमारा परिवार माँ पापा,तीन बहनों और एक भाई से भरपूर परिवार थाकई माद्यम वर्गीयों की ही तरह जिंदगी थीपापा भिलाई इस्पत्भावन के उच्चवर्गीय कर्मचारी थ

मध्यप्रदेश में स्थित भिलाई रशिया लोगों द्वारा निर्मित था जिस जगह हम रहते ठ वहां कुछ लोग राष्या के रहने वाले हैं हमारे एक तरफ़ यूपी के शर्माजी और एक तरफ़ आंध्र के नायडू रहते थें

उनके बाजू में एक पंजाबी परिवार था जो बहुत करीबी दोस्त थे जिनको हमारी तेलुगु समझ नही आती और हमें उनकी भाषा पर इससे दोस्ती में कोई फरक नही आता था

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