मेरे पिताजी इस्पत्भावन में फोरेमन थेउनको जो घर मिला वोह तीन नम्बर सड़क पर थाहमारे जिंदगी के शुरू के दस साल वोहीं पर गुजरे हमारे दोस्त कई जाती और धर्मो से जुड़े थे उनके साथ बिताये पल आज भी बड़े सुहावने लगते है कितने प्यारे दिन थे उसी घर में हम चार बहनों के बाद एक प्यारे से भाई का जन्म हुवा था उसी घर में हमारी बीमार बड़ी बहन की मृत्यु भी हुई इस जीवन की शायद यही रीत है कोई आता है तो कोई जाता है हमारे घर के आंगन में एक जाम का पेड़ हुवा करता था जिस पर हम चढ़ कर खेलते थे झूला झूलते थेहमारे कुछ दोस्तों के नाम भी मुझे याद है जैसे-बेबिरानी,कुलजीत,शालिनी,मधु,लक्ष्मी,तिरुमाला,गुग्गु,लल्लू,पिताजी साइकिल पर ऑफिस जाते थे
दसहरा से दीपावली तक स्कूल की छुट्टियाँ होती थी एक महीने का मेला लगता था ,हम तीन चार बार जाया करते थेबहुत मजा आता था में और मेरी चोटी बहने बहुत ही मजा लेकर हवाई झूले झूलते थेएक साथ दस टिकेट लेकर झूला उतारते ही नही थे गोल्गुप्पे,चाट खाते थे
हमारे सड़क के अंत में एक गली थी जहा के पुल पर बैटकर आतेजाते रेलगाडियों को देखते थेउन दिनों अचानक एक छोटे से कुत्ते ने हमारे सड़क मई प्रवेश किया जिसे हम सभी बच्चे ने मिलकर पला और उसका नाम रखा पकुरु ,कई दिनों बाद उसने ना जाने क्या खा लिया बिचारा मर गया हम सबने बहुत दिनों तक शोक मनाया
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