Friday, August 28, 2009
श्रधांजलि
हम चारो बच्चे एक दुसरे की हिम्मत बनकर उन दिनों का डटकरसामना किया छेह महीनो के बाद मेरी शादी हो गई साल भर में मैं एक प्यारी सी बच्ची की माँ बन गई एक साल के बाद मेरी दूसरी बहन की शादी हो गई उसके दो लड़के हुए उसके चार साल बाद तीसरी बहन की भी शादी होगई जिसके एक लड़की और एक लड़का हुवे उसके आठ साल बाद मेरे एकलौते भाई की शादी हुई वोह इंजिनीअर बन गया ,उसकी दो प्यारी सी बेटियाँ है हम सुब बहुत खुश है पर यह सब देखने के लिए माँ नही हैचार साल पहले उनका अचानक देहांत हो गया आज हम जो भी है ,उनकी ही कृपा और असीम कृषि है वोह जहा भी है हमें आशीर्वाद दे रही है यह लेख उनकोमेरी श्रधांजलि hai
Tuesday, August 25, 2009
Friday, August 21, 2009
jeevan
को हमने साथ गुजारा है माँ सुबह सबेरे उठ जाती थी सब लोगो को जगा देती थी ,हम सब हॉल में इकट्ठे बैठ कर इधर उधर की बातें करते थेकभी कभी चर्चाये भी चलती थी की भविष्य योजनाओ के बारे में मैं और मेरी बहन दोनों कई मुद्दे उठाते थे जिनका समाधान पापा करते थेमुझे लगता था की हमारे पापा जैसे पापा बहुत कम लोगो को नसीब होते है
मेरी दो बहने थी ,दोनों रंग रूप ,विचारों आदि में बहुत अलग थी हम सब माँ से संगीत सीखते थे संगीत हमारे जीवन का एक खास अंग था रोज रियाज करते थे माँ संगीत के क्लास भी लिया करती थीहमारा एक भाई है जो हमें बहुत प्यारा है आज दो बच्चो का बाप है उसकी साड़ी जिम्मेदारी हम बहनों को सौंप दी गई थीहम उसे पड़ते थे खिलते थेकई मिन्नतों के बाद भगवान् ने उसे हमारे यहाँ भेजा थामाँ के अन्तिम समय तक उसने माँ की खूब सेवा की
Thursday, August 20, 2009
हमारे जैसे ही इंग्लिश मीडियम स्कूलों के कुछ स्टूडेंट्स भी हमारे कॉलेज में दाखिल हुवे उनसे भी काफ्फी कुछ सीखने को मिला,उनमे उषा नायडू बेस्ट थी उसने हमें बहुत अजीज थी
मित्र
आँचल में दूध ,आँखों में पानीमहादेवी वर्मा की कविता के ये लाइन हमारे लिए सबसे प्रिय पंक्तिया थीमुंशी प्रेमचंद की गोदान, सेवासदन,निर्मला,रविंद्रनाथ की कहानियाँ,शरत चंद्र के उपन्यासपडी के बाद हमारी सबसे बड़ी कमजोरी थी कैंटीन के गरम -गरम समोसे वाह याद करती हूँ तो आज भी मुह मैं पानी आजाता है हम दोनों साइकिल पर कॉलेज जाते थे, बहुत धीमी गति से चलते थे लोग खूब चिडाते थे की कॉलेज पहुंचना है की इसी पर घुमते रहना है.हम उनकी तरफ़ देखते भी नही थे
कॉलेज के प्रोफेसर हमे बहुत चाहते थे क्यूंकि हमारी दोनों की पडी बहुत अच्छी होती थी ,फर्स्ट क्लास में पास होते थे
Thursday, August 13, 2009
वे स्वयं भी हमारे जिंदगियों में अधिक दखल नही देते थे फ़िर एकदिन अचानक उन्होंने हमसे अलविदा लेलिया ,कितनी खामोशी से उन्होंने निर्मोही बनकर अपने लाडली बेटियों और नन्हे से बेटे को छोड़कर परलोक सिधार गए
मुझे आज भी वोह काली रात याद है जब माँ खिड़की के पास खड़े बहार देख रही थी ,दुसरे दिन हमें नए किराये के माकन में जाना था जिंदगी के नए मंजिलो को तय करना थाहम सब भाई बहन नीचे चार पाई पर सोये हुवे थे अचानक मेरी नींद खुल गई मैंने उनको देखा मुझे बहुत दुःख लगा क्योंकि मेरी माँ बहुत सीधी सादी गृहणी थी उनको चूल्हे के सिवा कुछ नही आता था उनपर सारा दारोमदार आ पडा मई नही जानती माँ के अन्दर कितने तूफ़ान उमड़ रहे थे ,पर मैंने अपने आप से एक कसम लिया कि जिंदगी मई माँ कि जितनी हो सके मदद करुँगी
दुसरे दिन हम नई मंजिलो कि तरफ़ निकल पड़े हमे नही मालू किस तरफ़ जाना है ,कितने दूर जाना है ,कैसी कैसी मंजिले हमारी राह देख रही थीकितनी ही बातें है उसदिन मुझे नही मालूम पर लगता है कि अगर एक और मौका मिले तो काश और अची तरह से पापा के साथ और भी अधिक वक्त निकल सकूकाआआआआआआआआश ऐसा हो सकता,
पिताजी
- इस जिंदगी के अलग अलग पड़ावों में कई लोग मिलेइतने अलग -अलग तरह के सोचने वाले ,उनका पहनावा,विचार,जीने के तरीके ,बोलने ,उठने बैठने के तरीके लोग पुरी तरह से जीने के मजे नही लेते हमेशा एक डर उनके अन्दर समाया रहता है कल कैसे होगा ,क्या मेरी कोई मदद करेगा या नही इस कश्म कश में सारी जिंदगी निकल जाती है ,कब जिंदगी उनको छोड़ देती है उनको पता ही नही कितने अधूरे काम ,सपने छोड़ कर मानुष निकल जाते है
पिताजी यह एक शब्द ही नही हैहमारे लिए एक पुस्तक है ,सबकुछ उसमे समाया है ,आज हम जो भी है उनकी ही मार्गदर्शन मे ही चल कर बने हैहमारे जिंदगियों मे कई खुशी और गम का हमने डट कर सामना किया ,कभी हार नही मानीहमेशा इन तीस सालो में उनकी आत्मा हमें राह दिखाकर हमे शक्ति दी है
मुझे कभी भी याद नही है कि तीन लड़किया उनके लिए परेशानी होउन्होंने हमें एक दोस्त के ही समान माना ,हमेशा हमारे मांगो को पूरा किया ,किसी बात पर हम चिंतित होते तो इतनी शक्ति दी कि कभी भी उस विषय के लिए कोई शक नही रहता था
हम आज कही भी ,किसीसे भी बेधड़क मिल कर बातें कर सकते है ,समस्याओ का समाधान कर सकते हैहम बहने शाम होते ही सड़क के किनारे पुल पर बैठ कर उनका इन्तेजार करते थे ,उनके पास आते ही उनके साइकिल पर बैठ कर घर आते थे उनसे कितने स्कूल कि और माँ की शिकायते करदेते थे
Wednesday, August 12, 2009
दसहरा से दीपावली तक स्कूल की छुट्टियाँ होती थी एक महीने का मेला लगता था ,हम तीन चार बार जाया करते थेबहुत मजा आता था में और मेरी चोटी बहने बहुत ही मजा लेकर हवाई झूले झूलते थेएक साथ दस टिकेट लेकर झूला उतारते ही नही थे गोल्गुप्पे,चाट खाते थे
हमारे सड़क के अंत में एक गली थी जहा के पुल पर बैटकर आतेजाते रेलगाडियों को देखते थेउन दिनों अचानक एक छोटे से कुत्ते ने हमारे सड़क मई प्रवेश किया जिसे हम सभी बच्चे ने मिलकर पला और उसका नाम रखा पकुरु ,कई दिनों बाद उसने ना जाने क्या खा लिया बिचारा मर गया हम सबने बहुत दिनों तक शोक मनाया
Tuesday, August 11, 2009
छवि
भिलाई छोडेतीस साल हो चुके फ़िर भी कल की बात लगती है आजकल टाऊन शिप का जो निर्माण होरहा है इसकी शुरुवात बहुत पहले ही भिलाई में हो चुकी थीवहां पुरा टाऊन बीस सेक्टरों में बटाथा हर सेक्टर में बीस सड़कें होती थीहर सेक्टर में एक मन्दिर,एक शोपिंग मॉल ,एक प्राथमिक और माद्यमिक स्कूल होते थे,मैदाने होती थी हर सेक्टर के मैदानों मई दशहरा के दिन रावन जलाये जाते थे एक हॉस्पिटल होता था
भिलाई इस्पात भवन रुस्सियन के साथ मिलकर बनाया गया था इंडिया और रूसिया की मित्रता के याद मैं मैत्री पार्क का निर्माण हुवा लोग अपने परिवार के साथ इतवार के दिन समय बिताते थे
Monday, August 10, 2009
पहला अध्याय
हमारा परिवार माँ पापा,तीन बहनों और एक भाई से भरपूर परिवार थाकई माद्यम वर्गीयों की ही तरह जिंदगी थीपापा भिलाई इस्पत्भावन के उच्चवर्गीय कर्मचारी थ
मध्यप्रदेश में स्थित भिलाई रशिया लोगों द्वारा निर्मित था जिस जगह हम रहते ठ वहां कुछ लोग राष्या के रहने वाले हैं हमारे एक तरफ़ यूपी के शर्माजी और एक तरफ़ आंध्र के नायडू रहते थें
उनके बाजू में एक पंजाबी परिवार था जो बहुत करीबी दोस्त थे जिनको हमारी तेलुगु समझ नही आती और हमें उनकी भाषा पर इससे दोस्ती में कोई फरक नही आता था